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सामाजिक मंच या राजनीति का अड्डा

जब किसी सामाजिक कार्यक्रम में मंच पर समाज के वरिष्ठ लोगो, बुद्धिजीवियों, शिक्षाविदों और उच्च पद पर बैठे अधिकारीयो की जगह नेताओं और बाबाओं को बिठाया जाये तो मेरा मानना है समाज को ये तथाकथित समाजसेवी गलत दिशा की और ले जा रहे है, जब आप किसी कार्यक्रम को सेवा, शिक्षा और संस्कार के नाम पर कर रहे है और सामने मंच पर नेताओं और बाबाओं को बिठा रहे हो तो कार्यक्रम में आने वाले समाज के भविष्य बच्चों में क्या संदेश जायेगा? मेरा मानना है सामाजिक मंच पर केवल ऐसे लोगो को जगह मिलनी चाहिये जिन्हें देखकर समाज के हरेक बच्चे के साथ साथ बड़ो में भी एक संदेश जाये कि हमे भी इनके जैसा बनना है और समाज के लिये कुछ करके समाज के इस महान मंच पर शुशोभित होना है, न कि नेता बाबा बनकर मंच पर बैठना है। रही बात मंच की तो सामाजिक कार्यक्रम में किसी पार्टी के नेताओं को बुलाने का क्या औचित्य है? क्यों हम उन्हें हमारे समाज के इतने बड़े मंच पर बुलाकर उनकी जी हुजूरी करे? उन्होंने हमारे समाज के लिये क्या योगदान दिया है, पहले कर चुके वादो पर क्या काम हुआ है? और वो अभी हमारे समाज के लिये क्या योगदान देने की इच्छा रखते है? एक और बात...

विचारणीय

ख़ुद की राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिये पूरे समाज को एक ही राजनीतिक पार्टी के मंच पर ले जाना उचित नही है सत्ता तो बदलती रहेगी कभी भाजपा तो कभी कांग्रेस लेकिन पूरे समाज का नाम लेकर आप जब खुलकर सिर्फ एक पार्टी को समर्थन देना शुरू कर दोगे तो जब सत्तायें परिवर्तन होगी तब क्या समाज को इससे नुकसान नही होगा? मेरा मानना है जिस प्रकार सरकार सब की होती है उसी प्रकार समाज भी सबका होना चाहिए किसी पार्टी विशेष का नही। किसी भी समाज का कोई भी नेता हो किसी भी राजनीतिक दल में जाये अपना नाम ऊंचा करे आपका समाज आपके साथ खड़ा रहेगा लेकिन मेरा मानना है पूरे समाज को राजनीति को नही घसीटना चाहिये।
एक जमी-जमाई नौकरी आपको महीने की बंधी-बंधाई तनख्वाह, रहने के लिए छत और पेट भर खाना उपलब्ध तो करा सकती है परन्तु आत्मा की संतुष्टि शायद ही दे पाए। जीवन की समरस सी गति आपको सब कुछ दे सकती है परन्तु यह किसी के विवेक को चुनौती नहीं देती और आपको एक नीरस जीवन जीने के लिए छोड़ जाती है ।

सामूहिक विवाह और समाज

दोस्तों अभी कुछ दिनों से समाज मे सामूहिक विवाह के बारे में चर्चा परीचर्चा का दौर चालू हुआ है, सामूहिक विवाह आज के समय मे समाज के लिये जरूरत है लेकिन अभी तक जितने भी और जहाँ भी सामूहिक विवाह हो रहे है वहाँ हमे जोड़े की एक सही संख्या नही मिल रही है, आप सामूहिक विवाह में एक साथ 10 जोड़ो की शादी करवाओ या 25 जोड़ो की खर्च लगभग थोड़े बहुत अंतर के साथ एक जैसा ही होगा, फ़िर भी आयोजकों को जोड़े नही मिल पा रहे? इसका कारण देखा जाये तो अभी भी कुछ मध्यमवर्गीय व उच्च मध्यमवर्गीय परिवार अपने बच्चों की शादियां सामूहिक में करने से कतराते है कि लोग क्या कहेंगे ये तो खाते-पीते घर का है फिर भी बच्चो की शादी सामूहिक में कर रहा है, जब तक समाज इस मानसिकता को नही छोड़ेगा तब तक सामूहिक विवाह के आयोजन हर जगह और शहरों में करने का कोई औचित्य नही है, ऐसी मानसिकता को बदलने के लिये समाज की हर संस्थाओ के अग्रणिओ, समाज सेवको, नेताओ, आयोजको और दानदाताओ को आगे आना पड़ेगा! जब समाज के ये बड़े लोग अपने बच्चों की शादियां सामूहिक विवाह में करवाएंगे और चाहें तो होने वाली खर्च की रकम विवाह समिति को देंगे तो समाज मे एक अच्छा संदेश भी जा...

समाज सेवक या समाज कंटक

दोस्तो अभी कुछ सालों से हमारे समाज मे समाजसेवा करने वालो की बाढ़ आ गई है इसकी क्रोनोलॉजी आप को समझ मे आ रही है या नही मुझे नही मालूम लेकिन मुझे लगता है ये समाज सेवा ना होकर अपने अपने ईगो (ऐब) की लड़ाई मात्र बनकर रह गयी है, कोई अपने आप को ही बड़ा समाज सेवक दिखाने की कोशिश में लगा हुआ है तो कोई समाज सेवा के नाम पर अपनी दुकानदारी चमकाने में लगा हुआ है,  समाज मे ऐसे कार्यक्रम कराये जा रहे है जिसमे समाज को फायदा हो या ना हो पर संगठन अपनी बैलेंस सीट मजबूत बनाने में लगे हुए है। स्वयंभू समाज सेवको ने अपनी एक ऐसी टीम (गैंग) बना दी है जिनको समाज को कैसे अंधेरे में रख कर काम करवाना है बखूबी से आता है।
ज़ुबान कतरनें के डर के कारण चुप हो जाने से लाख गुना बेहतर है बेज़ुबान ही पैदा होना !  ऐसे छुपे लोग फिर कभी भी फ़िज़ा बदलने को कलम, कदम और क़सम उठा नहीं पाते हैं। 

समाज सेवा

आओ समाज सेवा की दुकान चलाते है, किसी अमीर को मंच पर बुलाते है, उसका सम्मान कर साफा पहनाते है, उसे ख़ास होने का एहसास दिलाते है, फ़िर उससे लाख टका लेकर मूर्ख बनाते है, अमीर से लेकर ग़रीब को देने का विश्वास दिलाते है, ज्यादा लेकर थोड़ा बाँटने का ढोंग रचाते है, आओ समाज सेवा की दुकान चलाते है।।