एक जमी-जमाई नौकरी आपको महीने की बंधी-बंधाई तनख्वाह, रहने के लिए छत और पेट भर खाना उपलब्ध तो करा सकती है परन्तु आत्मा की संतुष्टि शायद ही दे पाए। जीवन की समरस सी गति आपको सब कुछ दे सकती है परन्तु यह किसी के विवेक को चुनौती नहीं देती और आपको एक नीरस जीवन जीने के लिए छोड़ जाती है ।
सामाजिक मंच या राजनीति का अड्डा
जब किसी सामाजिक कार्यक्रम में मंच पर समाज के वरिष्ठ लोगो, बुद्धिजीवियों, शिक्षाविदों और उच्च पद पर बैठे अधिकारीयो की जगह नेताओं और बाबाओं को बिठाया जाये तो मेरा मानना है समाज को ये तथाकथित समाजसेवी गलत दिशा की और ले जा रहे है, जब आप किसी कार्यक्रम को सेवा, शिक्षा और संस्कार के नाम पर कर रहे है और सामने मंच पर नेताओं और बाबाओं को बिठा रहे हो तो कार्यक्रम में आने वाले समाज के भविष्य बच्चों में क्या संदेश जायेगा? मेरा मानना है सामाजिक मंच पर केवल ऐसे लोगो को जगह मिलनी चाहिये जिन्हें देखकर समाज के हरेक बच्चे के साथ साथ बड़ो में भी एक संदेश जाये कि हमे भी इनके जैसा बनना है और समाज के लिये कुछ करके समाज के इस महान मंच पर शुशोभित होना है, न कि नेता बाबा बनकर मंच पर बैठना है। रही बात मंच की तो सामाजिक कार्यक्रम में किसी पार्टी के नेताओं को बुलाने का क्या औचित्य है? क्यों हम उन्हें हमारे समाज के इतने बड़े मंच पर बुलाकर उनकी जी हुजूरी करे? उन्होंने हमारे समाज के लिये क्या योगदान दिया है, पहले कर चुके वादो पर क्या काम हुआ है? और वो अभी हमारे समाज के लिये क्या योगदान देने की इच्छा रखते है? एक और बात...
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